मैं दीप से खुशियों में था~

वो भी लौटकर आ गया जो कभी इत्तिफ़ाक़ में था,
बस यही अच्छी बात है की वो दिल के राह में था।

धीरे-धीरे सब उम्र के साथ बे-असर होने लगा जब,
इतना आसान नहीं रहा जो भी मेरे मंजिल में था।

हर हाल में मुस्कुराता रहा खुद को धोखे में रखकर,
मैं नज़रे बंद रखता था तब भी दिल धड़कने में था।

दबा हुआ दिल में प्यार अभी भी है जो पहले से था,
लोग जलते रहे मेरे दीप में और मैं उसकी खुशियों में था।

दरमियाँ हमारे ये फासले जाने कहा से आ गए थे,
उसे गले से लगाए बिना बिछड़ना मेरे नसीब में था।


                                            By~ Pradeep Yadav




हिज्र;
separation from beloved
जुदाई, वियोग, विछोह, विरह

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