अल्फ़ाज़ों का सफ़र~
मैं कौन हूँ अगर लफ़्ज़ों का ये असर न होता,
मेरे वजूद में कोई भी ये सफ़र न होता।
ये जो मैं ढूँढता हूँ ख़ुद को हर एक मिसरे में,
अगर ये अदब न होता, मैं भी बशर न होता।
किताब, शेर, ग़ज़ल, सब एक सिलसिला हैं मेरा,
इनके बिना ये दिल कहीं भी मुंतशिर न होता।
जो दर्द सीने में था, वही क़लम में ढलता गया,
अगर ये सोज़ न होता, ये भी हुनर न होता।
मैं लिखता रहा तो खुद से मिलता रहा हर बार,
वरना ये आइना भी इतना बेख़बर न होता।
ये अश्क, ये तख़य्युल, ये अल्फ़ाज़ की दुनिया,
इनके बग़ैर जीना भी कोई सफ़र न होता।
प्रदीप, ये शायरी ही है जिसने थामा है मुझे,
वगरना मैं भीड़ में होता, मगर इधर न होता।
मेरे वजूद में कोई भी ये सफ़र न होता।
ये जो मैं ढूँढता हूँ ख़ुद को हर एक मिसरे में,
अगर ये अदब न होता, मैं भी बशर न होता।
किताब, शेर, ग़ज़ल, सब एक सिलसिला हैं मेरा,
इनके बिना ये दिल कहीं भी मुंतशिर न होता।
जो दर्द सीने में था, वही क़लम में ढलता गया,
अगर ये सोज़ न होता, ये भी हुनर न होता।
मैं लिखता रहा तो खुद से मिलता रहा हर बार,
वरना ये आइना भी इतना बेख़बर न होता।
ये अश्क, ये तख़य्युल, ये अल्फ़ाज़ की दुनिया,
इनके बग़ैर जीना भी कोई सफ़र न होता।
प्रदीप, ये शायरी ही है जिसने थामा है मुझे,
वगरना मैं भीड़ में होता, मगर इधर न होता।
By- Pradeep Yadav
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