पहचान छुपाने से~
मैं कहां था मोहब्बत के पिंजरे में,
मसला ये है की मैं मिल सकता था अपने हौसले से,
मैं मिला देता उस शाम तुम्हें अपने से,
रह जाती रात बातों के साथ घुल कर यादें बनने में।
मैं कहां जाता अंजान से चेहरों में,
मसला ये है की मैं टीका हूं अपने हाथों पैरों पे,
मैं मिला देता उसकी मिठास खटास से,
रह जाती बुराई मगर वो नहीं हो सकती सबकी बाहों में।
मैं कहां था जिंदगी के ख्यालों में,
मसला ये है की मैं मिल सकता था दुबारा जाने से,
मैं मिला देता खुदको किसी शाम दीवाने से,
रह जाती रात पुरानी बातों को उड़ा के आगे बढ़ने में।
मैं कहां जाता अंजान सी चार दिवारी में,
मसला ये है की मैं टीका था अपने सातिर विचारों पे,
मैं मिला देता आखिरी बार मोहब्बत से,
रह जाती जीत मगर वो हो नहीं सकता था नफरत बढ़ान में।
By~ Pradeep Yadav
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