सुब्ह-ए-नौ तक~

कहते है मेरे अपने बहुत बड़े-बड़े सपने सजाए हम,
एक सुलझे इंसान से थे कि खुद को उलझाए हम।

क्या-क्या ना जाने कहने को कलम उठाए हम,
फिर सवाल कर के खुद के जज़्बात को दबाए हम।

ठंड से हर कोई गुजारता मगर इक उसके आसूं से,
खुद की जिंदगी तूफ़ान में जा कर बसाए हम।

चेहरे कब तक पढ़ते सबके तकलीफ़ के या प्यार के,
अपने से उम्मीद जगा कर पलकों में छुपाए हम।

सबको फूल पसंद आते है तस्वीर निकलवाने में,
क्या कभी जिंदगी में राहों के कांटे को गले लगाए हम।

गज़लें लिखने से कहां गम घटते है जो घटाए हम,
अभी तक अपने शब्दों से पर्दा कहां उठाए हम।

तेरे जुर्म भी पूछते है मेरे रहम से सुब्ह-ए-नौ तक,
क्यूं गहरे अंधेरों में निकलते है उजाले सजाए हम।

दिल से सब अच्छे-अच्छे है तो बुरा किसको बताए हम,
जो बुरा-बुरा बोलता है उसके जहां में जा कर घर बसाए हम।

                                                By~ Pradeep Yadav



भेस;
Sanskrit ; Noun, Masculine
disguise, feigned appearance, assumed, likeness, manner, dress, life style, camouflage, semblance, likeness

सुब्ह-ए-नौ;
Noun, Feminine
new morning, a fresh start

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