आत्मनिर्भर~
घर में क्यों पड़े हो तो सड़कों पर क्यों खड़े हो,
हालत यही है आज कल हिंदुस्तान की,खुद के लिए अब तक क्यों नहीं आत्मनिर्भर बने हो।
वो ज़माना आ गया की तुम क्यों साहिल पे जा कर खड़े हो,
जनाजा लिए घूम रहा बीमारी की तुम क्यों निकल पड़े हो,
अब निकलते है घर से जैसे बेज़ुबान से ग़ज़ल किए हो।
ये दुनियां अपने ही धरती के पानी से डुबनी थी,
फिर क्यों मिट्टी बदन पे लगाकर भार सारा ढोए हुए हो,
बचा हुआ भी लूटकर ले जाओ आखिर अब कौनसी परेशानी में पड़े हो।
सुना होगा काबिलियत तभी तो खुद की जेब भरे हो,
पैसा जहां-जहां छुपाए रख सकते थे वहां भर के,
अगले चुनाव के लिए लाशों पे पैसे लिए खड़े हो।
By~ Pradeep Yadav
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