ए-जिंदगी~

ए-जिंदगी ऐसा भी खेल मत दिखाया कर,
पल भर हसाया कर तो दो पल मत रुलाया कर।

घर से बाहर आया हूं सड़क पर तंग हो कर,
आहिस्ता-आहिस्ता हवा से मेरे दर्द की दवा कर।

ऐसा नहीं है की अब आ कर तू ख्याल कर,
अनजान हूं अनजान सा समझ के मिला कर।

ए-मेरे मन तू क्यों दुखी है प्यार के दीप जला कर,
जाने क्यों आग पे दिल बुझाता हूं बार-बार जला कर।

जब देखा नैन तो बोला अपनी नज़रे उठा कर,
मैं जचता हूं पलकों से दूर आसुओं को झटका कर।

ए-जिंदगी बहुत खुश है न रातों को जगा कर,
तोड़ दे ये बचे हुए भी सपने हौले-हौले दिखा कर।


                                               By~ Pradeep Yadav

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