क्या होगा~
ये सोच के मान लिया की किस्मत में लिखा होगा,
पेड़ के साए में बैठे है बचपन से तो धूप क्या होगा।
छांव में रखा है खुद की छवि ने तो दीप से क्या होगा,
मुस्कान छिपाने से गम छिपता तो परछाईं का क्या होगा।
मुद्दत बाद फिर आया है इक सवाल मेरे मन में की,
दरिया-दरिया करते हो तो डूब के मरने से क्या होगा।
समंदर की गहराई का पता चलते ही रेत फिसल जाती है,
लड़ना ही है अगर प्यार में तो लहरों की धार से क्या होगा।
माना की मुश्किल है निभाना साथ तो रहने दो ना फिर,
पहले भी कई बंधन में जुड़ते थे तो दिखावे से क्या होगा।
लोग पूछते है की एक इंसान के बदलने से क्या होगा,
शहर गांव में नहीं बदल सकता तो बदलाव क्या होगा।
उतर भी आओ आसमां के बादलों से कभी ज़मी पर,
दिल को अंगारे दिखाओ अब सिर्फ बारिश से क्या होगा।
By~ Pradeep Yadav
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