गरीब~

आज हमें सवाल करना है गरीब बेचारों के लिए,
लुटेरे हाथ चार पाए हैं क्या पैसे बटोरने के लिए।

बेगुनाहों का गला घोटते है अपने निसाने के लिए,
सितारे जड़ दिए हैं अपने निसान छुपाने के लिए।

सपनों में दरिंदगी घोलते है बसे घर उजाड़ने के लिए,
उनका नाम आता है सबसे ज्यादा अमीरी के लिए।

हाथ लोहे के बनवाए हो जैसे दिल टटोलने के लिए,
अब पत्थर मार के देखते हैं दिल तोड़ने के लिए।

आज हमें लड़ना है उन गरीब बेरोजगारों के लिए,
क्यों हम तौलते है उन्हें जो है अन्नागारों के लिए।

चलो यहां से चले कोई नहीं है उम्र भर के लिए,
नाम और पैसा भी नहीं रहा जीवन भर के लिए।

                                         By~ Pradeep Yadav


अन्नागार;
 [पु.(सं .)] 
अन्न का कोठा ।

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