पाओगे—
लौट आए तो क्या ज्यादा क्या कम पाओगे,
नफ़रत ले कर गए थे लौटकर क्या गवाओगे।
रात के अंधेरों में निकलोगे तो डर पाओगे,
सांसे चलती रही तो खुद को नया पाओगे।
नीले अम्बर में या महलों में मत खोजना मुझे,
घर में वहीं मिलेंगे जहां में तुम गांव पाओगे।
कुछ सड़के अच्छी है जिसपे चलना आसान है,
पहुंचना कठिन नहीं आओगे तो जान जाओगे।
पांव के शोर बाहर निकलते ही बहुत पाओगे,
वही से वापस लौटकर क्या शांत रह पाओगे।
सपनों के लिए खुद का दिल जलाकर देखो,
भरे घर में तुम खुद को खुद में कहां पाओगे।
इस धरती की हवा ज़हरीली है जान जाओगे,
आग ही आग है जलते और निखरते जाओगे।
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