दोस्त~


आज ये कैसे मोड़ पे हालत तुम मुझ को लाए हो,
क्या ख़बर छपी है यारों की जो तुम हकीकत दिखाने आए हो।

चमकते चांद का कौनसा दाग़ दिखाना है मुझ को,
पहले देखो सितारों से लफ्ज़ छीन के जो दोस्तों पे ग़ज़ले गाए हो।

आखिर आसमां के सीने में खंजर घुसा के क्या पाओगे,
मेरे इर्द-गिर्द तो सब अच्छे है तुम दोस्ती को क्यों मुरझाने आए हो।

मैं जानता हूं ये रास्ता भी और मेरी मंज़िल भी,
सब साथ छोड़ देते है अमिट राहों में चाहे बादलों के छाए हो।

मैं यहीं लिक्खूँ दोस्ती-यारी फिर हर्फ़ गवाही लाएगा,
तुमने नहीं देखा होगा बिना खून के रिश्ता तभी लहू मांगने आए हो।

नाखून से गड के दिल को अपना चांद बनाए हो,
अब जो ख़ामोशी से चुभना चाहते हो तो यार बन के आए हो।


                                              By~ Pradeep Yadav





हर्फ़;
Arabic ; Noun, Masculine, Archaic, Singular
blame, censure, reproach, criticism, animadversion, stigma
letter of the alphabet
statement

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