ना कर पाया—

तेरे इश्क़ के रंग में था उस रंग से खुद को अलग ना कर पाया,
तस्वीर थी जो चेहरे की मेरे दिल में खुद से जुदा ना कर पाया।

वक्त रहते मैं उसके खातिर कोई शे'र या ग़ज़ल ना कर पाया,
आज भी उसको देखकर मुस्कुरा लेता हूं मगर अफ़सोस ना कर पाया।

उसको गए सालों गुज़र गए ए-दिल तू उसे भुला क्यूं ना पाया,
मरते वक्त भी उसको देखना चाहता था मगर मौत से सौदा ना कर पाया।

अजीब ख़्वाहिश रही की रात जिंदा थी फिर भी मैं सो ना पाया,
इस बेगानी दुनिया में उस तक को खोया जिसे कभी ना पाया।


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