एक शायरी लिखी है, कभी मिलोगी तो सुनाऊंगा,
मैं गैर नही था कभी, प्यार से गले लगाओगी तो बताऊंगा,
एक ही मंजिल पे थे दोनो, कभी वापस मिले तो गेल लगाओगी ना?
मैंने झूठ बहुत बोले है, कभी मेरा सच सुन्ना चाहोगी क्या?
तकरीब सारे अपनाया था, कभी जुदा करना पड़ेगा ये सोचा ना था।
मैंने खोया है अपनी हर प्यारी चीज़ को तुम वापस आना चाहोगी क्या?
एक किताब भर दी थी मैंने अफ़सोस के एक हादसे से,
एक ज़िंदगी का वादा कर पाओ तभी आना चाहत में।
कुछ तुमने भी सहा है और कुछ मैं भी सज़ा काट रहा हूं,
राहें एक थी एक ही साथ थे, जुदा 

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