दर्द-फ़ज़ा—

मेरे उठ के चल देने से सबको क्या फर्क पड़ता है,
मैं रुक जाता हूं तो क्यों सबको दिखने लगता है।

राह में कोई संभालता नहीं खुद संभालना पड़ता है,
आग लगने के लिए भी पत्थर से टकराना पड़ता है।

अब देखो बात समझाने को कितना लिखना पड़ता है,
जरा मुश्किल है लेकिन घुमा के समझाना पड़ता है।

मेरी मानो तो कभी-कभी हमदर्द भी दर्द-फ़ज़ा लगता है,
दोस्तों का साथ अच्छा हो तो पछताना नहीं पड़ता है।


                                       By— Pradeep Yadav


dard-fazaa;
दर्द-फ़ज़ा دَرْد فَزا
Persian ; Adjective
pain enhancer
दर्द बढ़ाने वाला

hamdard;
हमदर्द ہم درد
a sympathiser, a fellow, sufferer partner in adversity
एक सहानुभूति रखने वाला, एक साथी, प्रतिकूल परिस्थितियों में पीड़ित साथी

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