ए-ज़िंदगी~

इतना दर्द है कि सबसे आसूं रोकते नहीं बनता,
ए-ज़िंदगी तुझे जिए बिना ये मन भी नहीं भरता

इस सहर में अब कोई पेड़ के नीचे नहीं ठहरता,
टूटा कोई फल जो पेड़ से मगर हाथ में नहीं गिरता।

बार-बार इतना सताने पर भी तेरा मन नहीं भरता,
ए-ज़िंदगी फिर क्यों मेरे नज़रों से तू नहीं गिरता।

मेरी जिंदगी ही अगल है जरा जहां कोई नहीं मिलता,
मैं बिगड़ गया की अब कोई फिसल के नहीं गिरता।



                                               By— Pradeep Yadav

Comments

Popular Posts