इक अलमारी
कुछ झूठे वादे तेरे,
कभी मुझे नजरअंदाज किया।
एक वक्त था हम साथ सांस लेते थे,
अब तो सब कुछ भुला दिया।
सूरज ने भी जरा तो असर दिखाया होता,
खाई थी तूने कसमें हर सुबह,
तोड़ते ही भस्म तो किया होता।
क्या आग लगाए सीने में अब हम,
जो शख्स पानी चाहता था उसके हाथ से।
उसके जीवन में प्रेम की नदियां सूख गए हैं,
घर कि एक अलमारी सुनी रह गई।
By— Pradeep Yadav
Comments
Post a Comment