समाज

देखो जरा आंख खोल कर,
हमारा समाज कहां जा रहा।
बड़ों-बूढ़ों की इज्जत नहीं,
और खुद को स्वर्ण गुण संपन्न बता रहा।

है कमियां सब में यहां,
सुधार कौन रहा।
देखो जरा आंख खोल कर,
हमारा समाज बद से बदतर होता जा रहा।

है दूसरों की फिक्र सबको,
खुद की मुश्किलों का हल नहीं।
कोई शाराबी, तो कोई बेईमान है,
पूछ लो इनसे कारण हजार है।

देखो जरा आंख खोल कर,
हमारा समाज कहां जा रहा।
समाज के डर से है दिखावा,
पर खुद में कोई परिवर्तन नहीं आ रहा।


                           By— Pradeep Yadav

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