अब डरता नहीं
किताब पुरानी है ये, किरदार भी सब वहीं है,
अब वो जाने कहां है और मैं जाने किधर हूं।
वो मखमल सी और कई गुंड लिए थी,
मैंने अपने पैर देखे चप्पल भी टूटी थी, एड़ी भी फेट थे।
दिन गुजरे तन्हा और रात-सवरे होते रहे,
मंजिले बदली रही क्यूंकि खोने को कुछ रहा नहीं।
मैं अब डरता नहीं, सब कुछ यूं ही बता देता हूं,
पहले डर था न जाने किसका, अब तो बस यूं ही जी लेता हूं।
उसके बारे में मत पूछना, शायद झूठ ही बोलू मैं,
मेरा पता मत पूछना, मैं अब मिलूंगा एक ही जगह सबको।
By— Pradeep Yadav
Comments
Post a Comment