मुर्शिद~

मशरूफ था मैं कबसे गमों के शहर में,
ये बदकिस्मती पीछा क्यों नहीं छोड़ती।
मै ख्वाब बुन रहा था इन सबसे हट के,
बुरे वक्त की यादें क्यूं नहीं ढलती।
जुनून की क्या बात करें तुमसे मुर्शिद,
नशा था जो टूट गया और कोई नशा नहीं।
परिंदे से पूछो बेघर होने का सबब,
ना उड़ने में रहा ना ही घर गया कभी।
अपनों ने ही पत्थर उछाले ना जाने क्यों,
और मुझसे उम्मीद उड़ने की कर बैठे वो।
मेरे मर्ज की दवा बस लिख जाना है,
ये ख्वाब जुनून ना बने यही मेरा दवाखाना है।



                             By— Pradeep Yadav

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