मुर्दा सपने

मोहब्बत मंज़िल नहीं, सफर है।
कैसे कहूं तुझे अब अपना, मुझे औरों की जो फिक्र है।
असल में ये जहन्नुम है, जाना वहां है जहां मरते ही जन्नत है।

खामोशी से भरी ये कविता है, सुनो या पढ़ लो,
समझ तब ही आना है जब, खुद के साथ बुरा होना है।

लिखता हूं रेत पे, मिटा देती है लेहरे इसे,
उसके खत पे पानी था, जला दिया इक कोने से।

न मै इधर हूं, न मै उधर हूं,
उसके दिल में था, अब जाने किधर हूं।

अदाकारियाँ रखता है जमाने को अपनी तरफ,
मैं असाधारण था तभी तो ठुकरा दिया गया,...
और हो गया बुराइयों की तरफ।

जिसे अब आप पहचानते हैं उसे आप जानते नहीं,
मैं अपनों से हारा, शायद आप मुझे जानते नहीं।

इस शहर में कोई किसी का नहीं,
लोगो को...बड़ों की बातों का असर नहीं,
यहां किसी को किसी की खबर नहीं।

किसको जिंदा कहे किसको मरा हुआ कहे,
मै जो महसूस कर रहा अब वो अलग जुनून है,
हां, आप मुझे मुर्दा सपनों का घर कहे।



                           By— Pradeep Yadav


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