ग़ज़ल

एक लड़की है जो पास थी,
एक लड़की थी जिससे अब दूरी है।
एक ग़ज़ल है जो आधुरी है,
जज्बातों से अब दूरी है।

मेरी ग़ज़लों में वो अब भी शामिल है,
एक ग़ज़ल थी जो अब याद नहीं।
फ़ाड़ के पन्ना फेंक दिया मैं,
की अब मुझे कुछ याद नहीं।

हर रोज़ जो वो अपने हाथों से छूती थी,
उस लम्हें पर है ग़ज़ल ये मेरी।
जिस लम्हें में तु ठहरेगी,
अपने नाम से जुड़ने वालों के नाम को कुरेदेगी।

इस रिश्ते को कई साल हो गए,
धूल हटा दिया रिश्तों से अपने।
सवाल करके वो चली गई,
मेरे बाकी थे और वो मारने को बोल गई।

क्या कहना किसी और को,
सारे अपने छोड़ के चले गए।
एक ग़ज़ल लिखा उसके खातिर,
अब सारे ग़ज़ल में वो ठहर गई।


                     By— Pradeep Yadav


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