किनारा
डूबती हुई कश्ती को किनारा दिख रहा है,
साथ छूट गया है फिर भी उसको ही खोज रहा है।
मन है ये कैसा जो खुद की परवाह नहीं कर रहा है,
प्यार-मोहब्बत तो सब करते हैं ये दिल उसका बाप क्यू बन रहा है।
फिक्र कभी घर की नहीं और उसकी यादों को सजाया है,
प्यार तो सिखाया है पर भूलने का तरीका नहीं बताया है।
ये कश्ती ये वादियां ये खुला आसमां क्या कम है प्यार के लिए, तूने तो कर लिया दिखावा मुझे इक तरफा प्यार में पढ़ाया है।
डूब जाने की चाह होने लगी है अब मुझे किनारे नहीं जाना,
लहरें उछाल रही हैं ख्वाब और मुझे इसमें है डूब जाना।
By— Pradeep Yadav
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