मेरा खुद का कुछ भी नही, मैं तो खुद ही सबसे सिख रहा,
लिखना पढ़ना कुछ भी, में तो खुद ही सबका देख रहा।
मैं इस बढ़ती पीढ़ी में अपना बचपन लाया हूं
शारीरिक संबंध से हट के एक पैगाम लाया हूं
शिष्टाचार, बेवहार और आज के हाल लाया हूं
मैं झूठे वादे या तर्क नहीं अपनी मेहनत लाया हूं
मैं इस दुनिया का थोड़ा सा सच सामने लाया हूं
बलात्कारी, सियासत के मुद्दे भरे बाज़ार लाया हूं
कुछ कम ही कहा होगा मगर शराफत लाया हूं
मैं इनकी वजह से खुदको बचपन के पार लाया हूं।
Comments
Post a Comment