जो देश का होने गया—

ज़िंदगी में सब कुछ नहीं था मेरा आजमाया हुआ,
मैं देश का होकर भी अपने घर से निकला गया।

नज़रे मिली अपनों से तो ख़सारे का अंदाज़ा हुआ,
सियासत के खेल में खामखां गरीब ही मारा गया।

क्या मैं खुद को बचाता खुली आखों से सोया हुआ,
जंग लड़ने उतारा था दुश्मनों से अपनों से दुत्कारा गया।

तुम सारे मोहब्बतों में ही उलझे रहे ठीक ही हुआ,
मैं तो अपने रिश्तों से ही लड़ता और हारता गया।

क्या अपना भी कभी तुम्हारा तुमसे दूर सितारा हुआ,
उजाले में रौशन इश्क़ अंधेरे में लिबास उतारा गया।

कोई जिए भी कैसे अपने हयात से ही नकारा हुआ,
मेहरबान इंसान कहानी के आखिरी में बस मारा गया।

 

                                         By— Pradeep Yadav




KHasaare;
ख़सारेخسارے
deficits/ losses

Hayaat;
हयात
Life

mehrbaan;
मेहरबानمہربان
benign, Kind, kind hearted

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