जबसे दिल से निकले~
हम अपने वादों में सबके लिए पक्के निकले,
हम जीता हुआ हार के खेल में कच्चे निकले।
किसी की तो याद में लिखने चले थे और सच्चे निकले,
किसी की तो बात पे इरादों के पक्के निकले।
सुना था रास्तों में दिल लिए बहुत से थे निकले,
फिर भी हम सिर्फ नफ़रत में अच्छे निकले।
जोश दिखाना था और जब ज़माने में निकले,
दर्द और बुराई के घेरे में हम एक अकेले ही निकले।
संवाद किए थे शब्दों से जो कुछ बवाल ही निकले,
अपनी रचनाओं से अच्छे-अच्छों से अच्छे निकले।
इस ज़माने से सताए हुए दिल के मरीज़ हज़ारों निकले,
हम गम छुपा के रखें थे जो खुद ही हस्ते-हस्ते निकले।
फिर ऐसी जिंदगी आई जहां पेच-ओ-ख़म निकले,
बसर करने को गह में अब्र-ए-करम जरा कम निकले।
By~ Pradeep Yadav
pech-o-ḳham
पेच-ओ-ख़म
Curves, twist & turns
Trouble, ups and down, difficulty
mashq-e-sitam
मश्क़-ए-सितमمشق ستم
practice of cruelty
क्रूरता का अभ्यास
gah
गह گہہ
Transitive verb
place
abr-e-karam
अब्र-ए-करम اَبْرِ کَرَم
cloud of favours
बख़्शिश का बादल, बादल की तरह दानशीलता
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