कैसे बयां करूं—

ख़्वाब में मर जाने से उठ जाना कैसे बयां करूं,
जो प्यार है मेरा उसे अब खूद से कैसे दूर करूं।

अब मजे-मजे में किस-किस को यूं परेशान करूं,
मेरे ख़्याल में होने वाले किस्से बातें किससे करूं।

ज़िंदगी की रेखा ऐसी है की देख मैं मुस्कुराया करूं,
बस यही सोचूं की मैं उसको खुद से कैसे दूर करूं।

ख़्याल एक हुआ करते थे अब फिर से कैसे एक करूं,
सुंदर नहीं थी वो लेकिन उसकी सादगी कैसे बयां करूं।

सच तो कह रहा था अब तक झूठ को सच कैसे करूं,
ख़ामोशी थी सवालों पे अब फिर से शुरुवात कैसे करूं।

उसको अपने वक्त का तकाज़ा भी नहीं तो क्या करूं,
गुज़र जाते हैं तन्हा लम्हे फिजूल ख्यालों में ही क्या करूं।


                                            By— Pradeep Yadav

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