घर कस्बे~

कभी खुद के हालात पे रोया कभी औरों पे गुस्सा आया,
शब्द रोए और लोगो ने वाह वाह करके मुझे आजमाया

हम तो ये मानने लगे थे की हम भुल गए बिता हुआ कल,
लेकिन सवालातों की कतार ने फिर से मुझसे लिखवाया।

यहां हर एक शक्स समझ के भी हो गया अनबुझा सा,
आज तक कोई उसके घर या कस्बों में ना लौटा दुबारा।



                                        By~ Pradeep Yadav

Comments

Popular Posts