मेरे प्यारे-प्यारे पाठकों को प्रदीप यादव का नमस्कार पूर्ण आशा है की आप सभी स्वस्थ होंगे। इस उपन्यास में मुख्य भूमिका में खुद को रखना ज्यादा उचित समझा है।
इस उपन्यास के संस्करण पर शब्द लिखते समय मैं समझ नहीं पा रहा हूं की क्या लिखूं? मुझे नही पता कैसे लिखते है उपन्यास, कृतज्ञतापूर्वक सभी पाठकों को ह्रदय से धन्यवाद करना चाहूंगा, जिन्होंने इसकी कलात्मक अपरिपक्वता के बावजूद पढ़ा और पसंद किया है। मेरे पहले उपन्यास के क्षणों में मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैंने पहली बार दौड़ना सिखा, साइकिल चलाना सीखा या या फिर मैंने पहली बार जाना मेरा भारत कितना महान है।

                       — प्रदीप यादव

सभी को अपने जन्म स्थल से बेहद प्रेम और लगाव होता है ठीक वैसे ही मैं भी अपने जन्म स्थल से काफी जुड़ा हुआ हूं और मेरे दिल के करीब है, अगर आप यह मानते हैं कि इस पृथ्वी या इस ब्रह्मांड को देवी देवताओं ने बनाया है तो यह भी कहना मेरा गलत नहीं होगा की इलाहाबाद नगर किसी से उनमें से एक होगा। ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट, गठन, जिंदगी और रहन-सहन में कोई बाधा या मुश्किल नहीं है, एक बिखरी हुई सी अनियमितता और हर तरफ बेहद सीधे-साधे और साधारण से भोले-भाले लोग जो हमेशा मदद करने के लिए तैयार रहते हो। हाल ही में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया है लेकिन मैंने जो १२ साल जिए अपने जिंदगी के वहां तब वह इलाहाबाद था। सीतापुर की चॉकलेट से बनारस की गलियों से लखनऊ की चौड़ी सड़क जैसे ही ख्याति प्राप्त, प्रसिद्ध है इलाहाबाद, जहां बात होती हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः ये त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है और यहाँ हर छह वर्षों में अर्द्धकुम्भ और हर बारह वर्षों पर कुम्भ मेले का आयोजन होता है जिसमें विश्व के विभिन्न कोनों से करोड़ों श्रद्धालु पतितपावनी गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाने आते हैं। इस नगर को संगमनगरी, कुंभनगरी, तंबूनगरी आदि नामों से भी जाना जाता है। ये तो हो गया वो जिससे ज़माना जनता है लेकिन असल में ये प्रेम और धर्म की नगरी इतनी ही नही है, यहां गुंडागर्दी, मार-धाड़ और अविकसित है। भारत कहने को तो के कई जगह अविकसित हैं लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी बड़े राज्य और मुख्य स्थल वाली जगह का भी पिछड़ा रह जाना कहीं ना कहीं मुझे आज आज भी दुख देता है।
बात है जुलाई २००५ की जब इलाहाबाद के एक क्षेत्र में मेरा घर बना जिसका नाम है गंगापुरम, जहां से यादों का मेला शुरू हुआ और खेल-कूद से लड़ने झगड़ने से गिरना सीखना और जीने-मरने तक सब तय हो गया था। दोस्तों से ऐसा सुपरिचय, घनिष्ठता और मेल-जोल था कि ये चांद भी शरमा जाए, तारे थे उसके इर्द-गिर्द शोभा बढ़ाने को और मेरे दोस्त,मेरे यार ऐसे थे की सब भाड़ में जाए पहले दोस्ती आए।
मैं अपने माता-पिता और बड़ी बहन पूजा और सबसे बड़े भैया सोनू के साथ रहता था। घर के सामने एक सड़क थी और घर के पीछे सड़क थी घर के सामने वाली सड़क के उस पार एक घर था जिसमें मेरा घनिष्ट मित्र आदित्य रहता है और पीछे वाली सड़क पर तीन घर थे और दाएं से बाएं की तरफ जाने पर सबसे पहले अशोक भईया का घर था जो कि शहर में रहते थे और इस घर को गेस्ट हाउस बनाया रखा था उसके बाद मेरे मित्र प्रदुमन का घर आता है और फिर आखरी में डॉक्टर परिवार का, मेरे घर के बगल में एक घर था जिसमें एक पति पत्नी और भतीजी रहती है और बाएं तरफ एक बड़े से मैदान के आखरी में एक घर है जिसमें मेरा एक ऐसा मित्र रहता है जिसको हास्य की उतनी समझ तो नहीं है लेकिन मेहनती, बुद्धिमान और दिल से कोमल है और दाएं तरफ देखने पर मुख्य रास्ता निकलता है जहां पर कई घर है मगर एक घर हमारे दोस्तों में से एक दोस्त का है जिसका नाम पप्पन है।
जिन्होंने कभी नहीं देखी धूप ना बारिश बस सादगी में जिया है, लिख कर बयां कर रहा हूं दोस्ती बचपन की गौर देना जरा, 
जिन्होंने नहीं देखी कभी धूप ना बारिश बस सादगी में जिया है,
उन दोस्तों ने घर से गाली पडने से पहले मैदान नहीं छोड़ा है।
दोस्ती भी एक ऐसा सवेरा है जिसका उदय होना तो तय है लेकिन ढालना नही क्योंकि मित्रता एक ऐसा बंधन है जिसको अनेक लोगों ने अपनी गांठ दे रखी है, मेरी की जिंदगी मानो उस सूरज की तरह है जो निकल चुका है और दोस्तों से उसका प्रकाश है। मैं अपने दोस्तों के साथ सुबह-सुबह क्रिकेट खेलने सामने वाले मैदान में जाता हूं और धूप सर तक चढ़ने पे जब सबकी माएं बुलाया करती थी तब खेल बंद हुआ करता था क्योंकि सभी के पिता काम पर चले जाया करते थे तो डर तो मानो खत्म हो चुका था कि कोई रोकेगा नही और हमारा खेल चलता रहता था, हास्य चरित्र के लोग भी थे जिन्होंने बचपन की यादों में हंसी के ठहाके भरवाए हैं, जिनमें से एक प्रद्युमन के पिता थे जो की अपने काम से रोज खाली हो कर 5:00 बजे घर के दरवाजे पर बैठ जाया करते थे और पूरा मोहल्ला निहारा करते थे। हम बच्चों में उनका बड़ा खौफ था, उनके विशाल शरीर से या फिर उनके इलाहाबादी बोलचाल के तरीके से शायद क्योंकि उनका स्वभाव बहुत अच्छा होता है सभी से लेकिन उनका मज़क उनको ही भाता था। दूसरे हास्य चरित्र थे अंगद के पिता जो की एक मशीन थे और उन्होंने कभी मेहनत में ढिलाई नही दी। भारत में क्रिकेट के बहुत दीवाने हैं और यह लोकप्रिय होने की वजह से हर जगह खेला जाता है लगभग, आदित्य जो की मेरा का दोस्त है उसको इस खेल में ज्यादा ही रूचि थी और वह कोई भी खेल खेलें उसे सबसे प्रतियोगिता करने में अलग ही आनंद आता था। खेल का समय एक तरीके से निर्धारित था अगर छुट्टियां होती थी तो सुबह 7:00 बजे से 12:00 बजे तक और शाम को 3:00 बजे से 6:00 बजे तक या फिर दोपहर कह सकते हैं। प्रतियोगिता ऐसी कि मानो देश जीत लेंगे; खैर जिस मैदान पर खेल रहे थे वह भी हाथ नहीं आने वाला था, प्रतियोगिता की सीमा कुछ इस कदर सबमें बढ़ गई कि अब हम दूसरों के मोहल्ले में जाकर खेला करते थे और जीतकर आया करते थे। ये खेल सिर्फ शारीरिक ताकत नहीं दे रहा था कहीं ना कहीं भी सबको पता था कि सारे दोस्त साथ जब खेलते हैं तो पता चलता है की एकता का बल क्या होता है। मेरे दोस्तों में सबके पास कोई ना कोई कला थी क्रिकेट के खेल में, जैसे कि अंगद का गेंदबाजी तरीका काफी हद तक श्रीलंकाई खिलाड़ी मलिंगा से मिलता है जो कि चुनौती देता था बल्लेबाजों को और बल्लेबाजी तो कुछ खास नहीं थी लेकिन गेंदबाजी के दम पर चुना जाता था, अंगद सिर्फ दोस्त नही एक घर का फौजी था जिसने घर का हर क्षेत्र अकेले संभाल रखा था, उसके पिता का गाय-भैंसों का तबेला है और जानवर की सेवा से ले कर खुद की पढ़ाई और दोस्तों के साथ खेलना समय निकाल कर काफी मुश्किल होता था कई बार लेकिन उसकी उम्मीद की तकात इतनी होती थी की वो हस्ते हुए करता रहा है सब। बुद्धन जी नाम से मोहल्ला प्रसिद्ध ही अंगद के पिता है और वो काफी गुस्सैले स्वभाव के है, उनके हर एक बात खत्म होने तक आपको 4-5  गालियां मिल जायेंगी। उन्हें सीधा खडूस कहना ठीक भी नही होगा क्योंकि कई बार उन्होंने फुटबॉल और क्रिकेट जैसे खेलों में हास्य यादें छोड़ी है।
प्रदुमन बचपन में ही काफी अच्छा था सबके विचार से क्योंकि उसके पिता के प्रयोगात्मक स्थापना ने उसको लाल कर दिया था की ना जाने क्या खिलाया और तोंद भी आ गई जिसके बाद वो आलसी हो गया लेकिन इससे उसके खेल में फर्क नही पढ़ा, जो चक्के वो लंबे लंबे मारा करता था उससे उसके दौड़ने का काम बच जाया करता था और चक्के मरने आया करता था जो इंसान केवल धूप में गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण कर के उसके क्या कहने, अंगद ने तो उसका नाम जोशी रख दिया था उसके इस जोसिले स्वभाव की वजह से और इसका प्रमुख कारण एक खेला गया मैच भी था जिसमे जीत के लिए 3 गेंद में 13 चाहिए था और बात थी मोहल्ले से मोहल्ले के जीत की और सर्वश्रेष्ठ साबित करने की और मुख्य खिलाड़ी मोनू और आदित्य आउट हो चुके थे अब आखिरी उम्मीद प्रदुमन ही थे और उन्होंने पहली गेंद पे चक्का मार दिया जिसके बाद कप्तान आदित्य को भरोसा हो गया की ये कर सकता है और सभी जोश में समर्थन करने खड़े हुए और तभी दूसरी गेंद पे चक्का मार बराबरी कर ली तो फिर बारी आई आखरी गेंद की जिस पर उसके मोटापे के भार ने बराबरी पे खत्म किया खेल को आड़ में मोटापे की जीती बाज़ी हारे और जोशी नाम से नवाजे गए मित्र हमारे। पप्पन को क्रिकेट मैं काफी रुचि रही शुरुआत में और वह ऐसा खिलाड़ी था जो या तो बड़े स्कोर करें या फिर ना ही करें और जब करे तो एक तरफा कर दे सब, उसकी खूबी हम जान पाते हैं या पता लगा पाता की वो किस में माहिर है उसने सड़क के दूसरी तरफ मोहल्ले में दोस्ती बना ली और हमसे कटा कटा रहने लगा। मुझे याद है बचपन में एक खेल हुआ करता था पिल्लू सिटी जिसमें जमीन में एक छोटा सा गड्ढा करना होता था और बैट या फिर लकड़ी के किसी भी डंडे से उसको छेकना होता था और जो डेन हुआ करता हूं उसको जो छोटा सा गड्ढा बनाया है जमी में उस पर कब्जा करना होता था सामने वाले से पहले या फिर गेंद से शरीर पर मारना होता था। खेल काफी दिलचस्प था लेकिन उतना ही खतरनाक भी और खतरनाक इसलिए था क्योंकि एक हादसा मेरे से हुआ और यू कह ले की शिकार इसका अंगद हुआ। मैंने गेंद को मारने के चक्कर में लकड़ी के मोटे बेट से उसके माथे पर दे मारा और वह काफी नजदीक था आपके भी जिससे आप खतरा समझ सकते हैं इस खेल का।
हालांकि, अपने आप को बताया है की इलाहाबादी बहुत ही प्यारे भोले भाले और मददगार होते हैं और हमारे मोहल्ले में तो उनक भरमार थी, उनमें से एक हमारी भाभी यानी कि आदित्य मम्मी है जिन्होंने अंगद के चोट का फौरन घरेलू उपचार से ठीक कर दिया और सिर्फ इतना ही नही प्यार से समझाया भी गया की कौन सा खेल खेलना सही है और कौन सा खतरनाक। अपन को इस खेल की लत लग चुकी थी और वह इसको पैसों में खेलने लगा, सट्टा लगाने लगा जिससे हमारी बोलचाल काफी समय के लिए बंद हो गई और पप्पन का यह सट्टा लगाना जारी रहा। सिर्फ पिल्लु सिटी जैसे खेल में ही नहीं पतंगबाजी मैं भी और ना जाने कहां कहां वह व्यस्त हो गया।
मोहल्ले में कांड, मारामारी, बवाल अनेक होते रहे बातें होती रही, कुछ खुश तो कुछ दुखी रहे। इस बीच मेरा एक और छोटे पे का दोस्त गोलू अपने परिवार समेत हमारे मोहल्ले में रहने आया और वो हर क्षेत्र में काबिल और आगे था। हमसे उम्र में भी थोड़ा सा बड़ा था लेकिन ज्यादा नहीं, मित्रवत, दयालु और शिष्ट था। खुलकर मस्ती करना, जिंदगी जीने का अंदाज और बोलचाल की मिठास बेहतरीन है वो इंसान और हम उस जैसा दोस्त पा के हो गए थे गौरवशाली। मुझे याद है हम उसके साथ खेलकूद में साथ थे ही लेकिन साइकिल किया करते थे काफी क्योंकि वह हमें सबसे बड़ा था तो हमें इजाजत मिल जाती थी घरवालों से जाने की कहीं भी साथ में उसके और उसने हमें अन्वेषण कराया इलाहाबाद का वह भी साइकल से सड़क से परे चलाना और करतब करना, मंदिर, संगम और दूर-दूर तक जहां केवल चढ़ाना ढलान हो और भूतिया कहानी सुना के डराना, घर तक रेस लगाने जैसी चीजें सीखे उससे हम और जो आज हम सादगी की बात करते हैं, मैं उसको जब भी याद करता हूं तो मुझे सादगी का आदर्श उदाहरण वही समझ में आता है।
" हादसे कहां थमते है कहां उजाला हमेशा होता है,
  खुशियां सबके झोली में बराबर कैसे हो सकती है,
  भगवान हिसाब दुख सुख का ज़मी में करता है।"

मुख्य हास्य चरित्र प्रदुमन के पिता श्री, श्री इस लिए क्योंकि उनका स्वभाव था बेहतर लेकिन हास्य ऐसा की मजे सिर्फ खुद को आएं और सम्मान तो हम सभी का करते थे हमेशा से। मोहल्ले में हर दिन समान रूप से कटता गया और हम 


सवेरा तो दोस्तों की पुकार से होता था और अंधेरा घरवालों की डांट से हुआ, हम दोस्त भी कमाल के भूकंप आया था और हम साथ खेलने की जगह खोज रहे थे। 

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