कुछ जख्म आज भी सबके हरे हैं,
मुझे कल शाम का कुछ याद नहीं।

लगता है जबसे उसको है चोट लगी,
डरता है मानने से की हार गया है वो।

एक दिन लिखते वक्त रुक कर सोचा मैं,
क्यूं न इश्क की गलियों में मैं भी दाखिल हूं।

फिर जाने कैसी आग लाया था वो मौसम,
ठंड में बुखार ऐसा चढ़ाया था वो मौसम।

तन मन अपना सौंपकर उठाया कलम मैं,
मैं बावला ही ठीक था बवाल से कम था।

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