देख-भाल संस्कृति की~

राहों के ऊंच-नीच में जरा देख-भाल के चलना तू,
हैं उम्मीद मंजिल कि तो रखना कदम संभल के तू।

अगर बुराइयों को देख तू कदम रोक के बैठ जाएगा तो,
राते होंगी अफसोस कि कैसे अगला दिन बदल पाएगा।

तू अपनी गलतियों से सीख कुछ मायूस हो के क्यूं बैठा है,
तू अपना जवाब दें क्यों एक ही जवाब बार-बार लिखता है।

क्यूं तमाशे का आलम गाए तू चांद नहीं इससे छुपता है,
तू तानसेन या कबीर नहीं जो हर कोई सुनता या पढ़ता है।

अपराध ये देखते ही देखते खुदा का तू एक दिन हो जाएगा,
अभी आवाज़ बुलंद नही की तो बाद में तो तू बूढ़ा हो जाएगा।

सोच लो वक्त है अभी जो नजर आ रहा वो भी विलुप्त हो जाएगा,
इस पीढ़ी में पुराने खयालात वालों को उजाड़ के फेक दिया जाएगा।

रिश्तो की ऊंच नीच से हर एक शख्स वाकिफ है जहां,
तू बस कह दे मोहब्बत है बेशुमार तुझे रहता है तू जहां।

तू गर्व से पढ़ता होगा वीरता अपने देश के वीर जवानों की,
क्या तू सुन पाया कभी दुआ की गूंज उन गरीब बेचारों की।

21वी सदी का बस इतना प्रभाव है पैसे, जाती, रंग बेध के तमाशे का,
शब्दों के तमाचे से जवाब है और ना इनका कोई दूसरा इलाज है।

मुझे गर्व था अपने देश पे मुझे अपनी जन्मभूमि से प्यार है,
हमारी संस्कृति पिछड़ रही मैं कर्ज उतार कर अपना जाऊंगा।

सीमाओं पर जो लड़ रहे वो पूरे देश का देख-भाल कैसे कर पाएंगे,
भीतर से खोखला हो रहा है देश मैं इसको शब्दों से भरता जाऊंगा।

जो साथ खड़े है मेरे इस उड़ान पर उनको मेरा सलाम है,
शिकवा ना उनसे है ना ही शिकायत अब कोई जुबां पे है।

जो मैं निकला हूं ले के ये आसमां ना मेरी हार है ना जीत है,
इतना मुझको यकीन है अपनी कमान पर मेरे रीत में गुमान है।

मुझको विश्वास है पहुंचेगा मेरा ये तीर अपने निशाने पर,
इतना तो यकीन है "प्रदीप यादव" को अपने बोल पर।




                                             By~ Pradeep Yadav

Comments

Popular Posts