मुकालिमा~
अगर मुझे उठाना है अपने घर का भार तो थोड़ा ज्यादा क्या,
खयाल आजाद रखने वालों सुनो हमारे से दूसरे ज्यादा क्या।
दुनिया में गमों की बौछार बहुत है घरों की बहार में तुम्हारे रखा ही क्या,
वो बिस्तर से साए जैसा उठता था अंधेरे में खुद को ऐसे जलाया था।
आजादी से उड़ने वाले पंछियों तुम्हारे लिए ज़मी पे रखा ही क्या है,
मेरी बात मानो तो उड़ने से पहले जान लेना पतंग और मांझा क्या है।
किसी हुस्न वाली के पास छोटे से महताब में कितना आब-ओ-ताब रहेगा,
मेरे कुनबा की डांट में हयात होगी साथ ही कायनात से लड़ने की ताकत देगा।
By~ prawontgodeep, poetry
महताब~ चांद
mukaalima
मुकालिमा مکالمہ
dialogues
hayaat;
हयात حَیات
life, existence
aab-o-taab;
आब-ओ-ताब آب و تاب
splendour, glory, brilliance
brightness verbosity
kunba;
कुनबाکنبہ
family
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