नशा~

सुबह पलके खुलते ही मेरे हाथों में भरा इक जाम था,
इश्क का कहां बस है मैं बेगाने की महफिल में था।

नींद मुझे नहीं है आती कौन है मेरे अफ़्साने में,
कौन हैं ये जो अक्ल छोड़ के आई है काशाने में।

ये रोज-रोज सितारों का टूटना मेरे ख़्वाब में ही नही,
क्या संभालता किसी को मैं खुद पे मेरा वश है नहीं।

अगली सुबह धूप निकलते ही सर मेरा चकरा रहा था,
सबब सीख लिया खुद से खुद का शिगाफ़ करने का।

अब ये मेरे जाम अरमानों का नशा क्यों नहीं देते,
अब बोल " प्रदीप यादव " के मजा क्यूं नही देते।


                                      By~ Pradeep Yadav


kaashaane;
काशाने کاشانے
house, dwelling

afsaane;
अफ़्साने افسانے
tale, fiction, romance

begaane;
बेगाने بیگانے
strangers

shigaaf;
शिगाफ़ شِگاف
crack, fissure, split, cleft, crevice flaw, slit, rent

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