खेल
सियासत के खेल में, वो देश को बेच रहे,
हम खुद को बेच रहे, घर के खर्च के लिए।
हम हिंदू-मुस्लिम में फंस गए, देश पे बोझ बन गए,
करना था नेतृत्व आगे बढ़ के, हम प्यार में फंस गए।
देश को वो मिल के बेच रहे, हम सब सिर्फ देख रहे,
देश बेचने वाले एक हो गए, हम क्यूं पीछे रह गए।
By~ Pradeep Yadav
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