दिखावटी डर
मैं बड़ा होने में डरा हूं,
कहीं बचपन का सुख न खो दूं।
फिर मैं डरा कहीं मां दूर न हो जाए,
पापा से दूर रहा कहीं मार न पढ़ जाए।
फिर मैं डरा कहीं दोस्ती न टूट जाए,
नए दोस्त कहीं कमजोर समझ दूरी न बनाए।
फिर डरा कहीं कुछ ज़्यादा न बोल दू,
लड़कियों से दूर रहा कहीं मैं बदल न जाऊ।
फिर डरा कहीं प्यार न हो जाए उससे,
दूरी और समझाने से पहले ही कहीं हार गया मैं।
फिर डरा कहीं मर न जाऊ इतनी हार से,
देखा दुनियां मैं और जीत मेरी मझधार में।
फिर डरा मैं कोई पढ़ न ले मेरी कमियों को,
अब समझा मैं लोग पसंद करते है दिखावटी लोगो को।
अब भी मैं डरता हूं पर खुद की सोच से,
कहीं पागल न हो जाऊ इस बनावटी खेल में।
By~ Pradeep Yadav
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