रुकी कलम

न सीने पर है यंत्रणा,
न हाथों में कलम है।

न थिरकते कदम है,
न ही है कोई पीड़ा।

जिसमें घर है मेरा,
वाहा वजूद ही क्या है मेरा।

जिसे देखो वही परेशान है,
पैसा पाकर भी लाचार है।

न देखो कल की कमी,
न देखो आंसुओं की नमी।

न तो मैं हर शहर हर गांव आऊंगा,
न तो अब कलम उठाऊंगा।

नासमझ और अहंकार से भरे है यहां सब,
बराबरी भी करनी है और चाहिए सीढ़ी जीत की।

न वहम है कोई अब,
न ही कोई आस है।

न तो कोई है यहां तुम्हारे लिए,
न तो कोई हनुमान है।

न तो सोच बदली है,
न बदलेगी अब किसी की।

कुछ दम तुम दिखाना,
कुछ वो दिखाएंगे।

होते गलत कामों को घर से बदलना,
क्यूंकि बाहर निकलोगे तो घर वाले डरे सहमे रात गुजारेंगे।

न तो कष्ट है सीने में,
न तो गम है किसी कोने में।

बीमार है यहां सब अपने तरीके से,
कोई शराब तो कोई शबाब में।



                        By— Pradeep Yadav

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