उसकी सादगी का नूर
जिनका ख़्याल हमें दिन-रात सताता है,
क्या उन्हें भी हमारा ख़्याल आता है।
मेरी हर बात पर खफा होती हो,
जाने क्या बात है जो मनाने को सिर्फ हमें कहती हो।
चुप रहे, ना मिले तो खफा होती हो,
जो मिले, हाल पूछे तो दफा कर देती हो।
ढलेगी रात को नूर चारों ओर फैल जाता है,
कि चांद की रोशनी भी फीकी पड़ जाती है।
हंस-हंस के गैरों से बात करती हो,
शायद नूर का घमंड है जो हमें दिखलाती हो।
जानता हूं कि तुम्हें प्यार नहीं है मुझसे,
पर धोखे में रख के क्या साबित करना चाहती हो।
By— Pradeep Yadav
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