वो दूर करके खुश देखना चाहती है

कभी दिल को छूती तो कभी दिल उसके हवाले हो जाता,
मोह के अटूट मांझे सा ये रिश्ता पल-पल में कई बार टूट जाता।
कितना अर्सा लगा उम्मीद की लहर को पत्थर करते हुए,
मैं पीछे पड़ा मोहब्बत के जैसे जन्मो की दूरी लिए।
लेकिन आज फिर उस जगह से हम जुड़ गए,
जहां से हमने खुद को रुख़्सत किया था।
देखते-देखते ख्वाबों का वक्त गुजर जाएगा ,
देखने से बुरा कुछ नहीं है, तेरी क़ुर्बत से लगाव रह जाएगा।
क्या ये कम है कि मेरा आख़री बोसा तेरे जबीं पे रक़म किया गया,
धूल में मिल जाने से पहले तेरे गले लगने का ज़िक्र किया गया।


                             By— Pradeep Yadav

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