कोई

कविता महज शब्दों का खेल नहीं,
ये मेल है उनका, जिनका असल में 'कोई' नहीं।
कविता कोई गित नहीं,
ये वो संगीत है जिसका हर 'कोई' प्रीत नहीं।
कविता किसी का मुख नहीं,
ये शब्दों का मेल है जिसका हर बार 'कोई' आर्थ नहीं।



                   By— Pradeep Yadav

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