गरीबी~
हर पल खुद को जिंदा रखने के लिए बड़े संघर्ष है यहां,
सबके जीवन का हर एक दिन जैसे एक वर्ष है यहां।
किसी के सोच का पंछी जब कभी उड़ान भरता है यहां,
तब-तब गरीबी उसको पटक कर कहती है धूल है यहां।
वो सुबह उठता है सूरज से पहले तब मुर्गे भी सोते होंगे वहां,
मेरी कविताएं आईना है और बताती है जीवन का संघर्ष यहां।
आए हवाएं घरों में खिड़कियां खोल लिया करते हैं सारे यहां,
नींद डूबने के डर से नही मुंह खोले जिए वो दीवारों में जहां।
कौन किसका रखवाला है कौन सगा है किसका यहां,
इस जमाने से दोस्ती क्या जिंदगी में बुरा नसीब यहां।
सेहरियों के जुल्म से सूरज और रात का चांद जाने है कहां,
कुछ इंसानियत यहां भी दिखा जाए ऐसा वो इंसान है कहां।
हर पल ये कौन दस्तक दे रहा है मेरे अंदर से कौन है वहां,
मर चुके अंदर से और ये हिला के बोल रहे काम दे जरा।
अपना पसीना बहा के मेहनत के बदले गाली पा रहा हो जहा,
उसका क्या ही कसूर होगा जिसने जीने की कोशिश है यहां।
प्यार-मोहब्बत की अमीरी ख़्याल में वो कितनी देर रह लेता वहां,
मुंह से झरना टकराते ही संघर्ष कर के रोटी तोड़नी थी जहा।
किसी ने जब सोचा बड़ा बनने की दिखाई हिमात है यहां,
तब-तब अमीरों ने पैसों से फासला किया गरीबों से यहां।
By~ Pradeep Yadav
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