रंग~
मैं किस-किस की खोज में यहां कब्र से गुजरता रहा,
की राख-राख सा बिखरता और धूल में मिलता रहा।
मुझे तो इतनी ख़बर है की इंसानियत मुझमें हमेशा रही,
आखिरी दम तक हिफाजत और वादे हमेशा निभाता रहा।
सांस भर मिले हिस्से के खातिर मैं पूरा उसका हो के रहा,
जिस प्यार में मैं तंग और खुद को लहूलुहान करता रहा।
जिन्होंने प्यास में पानी पिलाया था उसी ने समंदर में डुबाया,
की डर-डर के खुद के घर को ख़्वाब में डूबने से बचाता रहा।
अबीज जंग रही मेरी अपने आपसे इस बात से भी लड़ता रहा,
की खुद की जिंदगी बे-रंग रही और सबके में मैं रंग भरता रहा।
By~ Pradeep Yadav
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