आज का बदलाव~
यहां सवालों के कशमकश में मेरी उम्र गुजरी है,
जैसे रेगिस्तानों से कोई बूंद जमीं से हो के गुजरी है।
अब की यारों मौसम ने हमें मंजर क्या दिखाए है,
जो जीव मर रहे थे उनके बदले हम जाने गवाए है।
हम प्यासों ने पानी को जहर करके तन्हा रातें गुजारी है,
न्याय को बेचकर रास्ते तबाही के खुद हमने निकाले हैं।
ऐसे आगे बढ़ के पिछड़े है जैसे हमारा गराँ ज़ियाँ हुआ है,
हम वो गुनहगार है जिन्होंने हमेशा नया सम्त निकाल लिया है।
by~ Pradeep Yadav
ज़ियाँ زِیَاں ;
loss, damage,damage, loss, detriment, injury, hurt
गराँ گراں ;
unpleasant/ costly
सम्त سَمْت ;
direction, side, course, dimension
path, road, way
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