शाम~

ले उड़ा ऐसे तेरा ध्यान मुझे,
सब लगते है अनजान मुझे।

तेरे ख्याल में ये जिंदगी गुजरी,
फ़ज़ा में तेरे धूप छाव में गुजरी।

अपनी शाम बचा के रखा था मैं,
वो अहद-ओ-पैमान में निकली।

सनसनाते है पुराने ख़्याल अब मेरे,
ज़ौक़-ए-बादा-कशी में रात बीती।

रच गई वो दर्द की धूप को ठंडक में,
वही शाम हूं जो डूबा पहले अंधेरे से।


                               By~ Pradeep Yadav


फ़ज़ा فَضَا ;
atmosphere

अहद-ओ-पैमान عہد و پیمان ;
promise and pledges

ज़ौक़-ए-बादा-कशी ذوق بادہ کشی ;
taste for enjoying wine

रच رَچ ;
make, form, workmanship, composition

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