अभद्र राजनीति~

किसी दिन हयात में करिश्मा क्यूं नहीं होता,
मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ सवेरा क्यूं नहीं होता।

खुदा की रहमत कहा गई अब कहा गया सबका भगवान,
क्यूं अब तक है हम अंधकार में क्या अब भी है अंधविश्वास।

हर कोई जूझ रहा है कोई मर रहा है कोई जी रहा है,
मैं हर दिन जी रहा हूं मुझे भरोसा क्यूं नही होता।

चारों तरफ देखो तीरगी का अक्स फैला हुआ है,
मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ बेदार क्यूं नहीं होता।

कहीं बादल है कहीं धूप है कहीं और ही कोई रूप है,
मैं इन सा नही ना ही मेरा कोई फ़रेब से रिफाकत होता।

मेरी इक हयात के ना जाने कितने पहलू है लेकिन,
मैं जाने क्यों किसी के हयात का हिस्सा नहीं होता।

कहीं आंसुओं की है दास्तां कहीं मुस्कुराहटों का बयां हुआ,
कहीं खो दिया कहीं कुछ पा लिया अपनों की लाश पे झंडा गाड़ दिया।

खुशनसीब हैं वो जो वतन पर मिटकर अमर हो जाते हैं,
बची जो एक बूंद भी लहू की धर्म में आग लगा देते हैं।

पांव में छाले मेहनत से ही नहीं महंगे जूतों से भी होते हैं,
काश इक दिन मैं सुबह उठू और यह देश बेदार हो जाए।

रहमत से ज्यादा मेहनत पर सबको यकीन हो जाए,
ख्याल होता नेताओं को जनता का तो वाकई मुख़्तार होता।

मनमर्जियाँ कर रहें सारे आजादी की कभी ये सुबह नहीं होने देंगे,
दिखा सकता हूं हुनर हैवानो से बेहतर क्या सुनेगा ये देश मेरा महान।



                                 By~ Pradeep Yadav

हयात~ life
तीरगी~ darkness
अक्स~ chhaya/ Chavi
बेदार~ wakefull/ jaagruk
रिफाकत~ saath
मुख़्तार~ स्वतंत्र/ azaad

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