शिकस्ता हुआ हूं~

ना जाने क्या दिल की मांग है,
सांझ भी मेरे लिए जैसे रात है,
मुकाम सा आसमां निहारता हूं,
गिरता हूं, संभालता हूं, भागता हूं,
ग़म-गुसार की चाहत जाने क्यूं है,
इस दिल से अदावत होने लगी है,
ऐ महरूम दिल अभी तो ज़ीस्त शुरू हुई है।

                            By~ Pradeep Yadav

शिकस्ता~ Tuta hua
ग़म-गुसार~ huardard
अदावत~ शत्रुता
ज़ीस्त~ zindagi
महरूम~ वंचित

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