खुदा~
मेरी ज़िल्लत और पस्ती इससे ज़्यादा क्या होगी,
मैं खुद को झुठला रहा किसी और की मर्जी क्या होगी,
तेरी मुआफ़ी तू ही ले जा मैंने खुद को ना मुआफ़ किया,
उम्र भर का पछतावा मैं रखता हु जा तुझे आज़द किया।
एक उम्र जैसे बीत रहा है मुझमें,
एक ज़माने सा बदला हूं मैं,
लाख शिकायते है दुनिया को मुझसे,
बस एक खुदा के सहारे संभला हूं मैं।
जिन्दगी का ये सफ़र ख्वाइशों से भरा था,
तुझपे ये इलज़ाम नहीं लेकिन मैं हार गया,
लाखों सवाल है खुद से आज,
क्यूं मैं उन्हें अल्फाजों में खोज रहा।
कोई ख़्वाब न ही गम खोज रहा हूं आखों में इंतजार देख रहा हूं,
मजबूरी इन हवाओं की नहीं उन्हें दिए तोहफों में पन्नों की है,
बरबादी की चपेट में कुछ इस कदर आया कि उमड़ा सारा शहर ये,
ये खुदा रोया साथ मेरे और दुनिया देखी चकाचौंध अगले सवेरे।
By~ Pradeep Yadav
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