बचपन

हम तो बचपन में भी अकेले थे,
सिर्फ दिमाग़ के घेरे में पले थे।
एक तरफ प्यार के तरसे थे,
एक तरफ दिमाग़ के खेल में उलझे थे।
जहां जिम्मेदारियों का भोज बड़ों में होना था,
मेरे बचपन को सबने काम के जोश में झोका था।
मासूमियत चेहर पर होनी थी,
चालाकी अपनों ने मुझ में घोली थी।
जिसने बचपन से हो पेट काटा,
उसे क्या है ज़िन्दगी का मोल है सीखना।
बचपन बदल गया या का शब्द आर्थ बदल गया,
जिस गांव जिस शहर में बच्चों की गूंज सुनाई देती थी आज वह वक्त बदल गया।


                                   By— Pradeep Yadav

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