गरीब

वो दिल में न जाने कितने जज्बात दबाए बैठा है,
सुकून से तो नहीं पता फिर भी कुछ सपने सजाए बैठा है।
अमीर तो बहुत है इंसानियत की कमी थी,
उस गरीब को सबने अनदेखा कर अमीर को और अमीर बनाया था।
कभी भूखे तो कभी अपने परिवार को एक वक्त की रोटी को थे तरसे,
उस आमिरी का भी क्या फायदा जो गलत ढंग से कमा के अपनों का भी भला ना कर सके।
लिए आंखों में दर्द दिल से रो रहा है,
क्यों होता है उनके साथ ही बुरा सिर्फ यह सोच रहा है।
क्यों है नसीब रूठा उन्हीं का???
सच ही है यह बात कि ये सिर्फ अमीरों के घर ही रहता है।
मन तो उनका भी करता है खेलने का पढ़ने का,
मिले खुदा तो पूछो कि क्या है उनकी खता।
हो गई कौन सी भूल जो हो गई सारी खुशियां उनसे दूर।
ऐसा क्या कसूर जो भूख में भी कर रहे है औरों के हुकुम कबूल।
जो है उनके हम उम्र, उन्हीं की कर रहे सेवा फिजूल।
क्यूं है इतने मजबूर???
मैं उठु सुबह स्कूल जाने के लिए, वह उठे रात के खाने के तलाश के लिए।
लिया है जन्म बस मालिक की सेवा करने के खातिर?
और पगार मिलते ही छीन ले उसका परिवार खर्च करें अपने आराम के मुताबिक।
कानून तो होते हैं सिर्फ गरीबों के खातिर,
ऐशो आराम तो उन्हीं के है जो छल-कपट कर जी रहे है महलों के अंदर।
आज अमीरों का हर दिन इतवार हो गया,
और गरीब हर दिन की तरह आज भी भूखा सो गया।
कभी गरीबों की सेवा करके देखो,
तुम्हारे लिए दुआओं का समंदर बेहिसाब लिए बैठे हैं।
दोनों हाथ जो पैसों में डाले बैठे हो,
एक हाथ मदत का उन्हें भी बढ़ाओ वो वफादार होने की चाहत लिए बैठे हैं।


                                By— Pradeep Yadav

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