जिंदगी
जिंदगी की दौड़ में, मैं कहीं पीछे रह गया,
मैं सीख न पाया फरेब, और दिल उसको चाहता रह गया।
बचपन में जब मन किया हंस लिया करते थे
और जब मन किया रोया करते थे,
पर अब मुस्कुराने के लिए उसकी मुस्कुराहट का साथ चाहिए
और रोने के लिए उसकी गोद में थोड़ी सी जगह चाहिए।
बाहों में आना चाहता था शायर बन के अल्फाजों को तरस गया,
कुछ पुरानी तस्वीरों में आज खुद को देखा तो मुस्कुराते हुए बचपन में खो गया।
चांद में दीदार तेरा आज भी मै करता हूं,
तू आ के मुझे रोशन करदे बस उस वक्त का इंतजार करता हूं।
चलो अब जीने की वजह ढूंढते हैं, अब तुम हमे ढूंढो,
हम ज़िन्दगी तुम्हे ढूंढते हैं।
By— Pradeep Yadav
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