सियासती खेल

देखो मचा है शोर गांव से शहर तक,
लोग बातें कर रहे अनेक।
कोई विकास कह रहा था,
कोई विनाश कह रहा था।
मैं पीछे मुड़कर देखा,
तो चुनाव आ रहा था।
अफवाहों का बाजार गर्म था,
कौन है सच में जीत का हकदार ये सबके दिमाग में चल रहा था।
नेताओं का मिजाज नरम था,
जनता फिर से जात, नौकरी और मुफ्तखोरी के भ्रम में था।
पिछली बार वादे किए थे वह तो निभा ना सके,
देखो अब कौन सी अच्छी अच्छी बातें लिखवा के लाए है।
नेता के भेष में दरिंदे, आज शायर के रूप में छाए है।
निठल्लो को मुफ्त में पैसे देकर जीत लेंगे चुनाव,
अगर हम जागरूक नहीं होंगे तो यह वक्त आने पर हमारा देश भी बेच देंगे।
मंदिर मस्जिद पर कर बवाल सियासती चाल चलते हैं,
चुनाव जीत के ताकत क्या मिल जाए फिर वो अपनी जात का की साथ देते है।
सिखा सकते हैं हुनर हैवानों से भी बेहतर,
अरे इनके तो घर भी चल रहे हैं हिंदू मुस्लिम को लाडवा कर।
जो पीठ पीछे देश बेच रहे हैं, वो क्यों नहीं मारवा सकते हमारे वीर सैनिको को कहीं दूर बॉर्डर पर।
शौक़ीन शबाब होते हैं, पढ़े जरूरत तो अपनों का भी खून कर देते हैं।
आंखें मूंदे चल रहे हो, जरा पीछे मुड़के देख भी आज देख लो,
ये शहर तुम्हारा ही है, या इससे भी बेच दिया कहीं और।
इरादे इनके बड़े खराब होते हैं, सुकून छोड़ जंग छेड़ देते हैं।
बेईमानी की खुली किताब होते हैं, मासूमों को खून के आंसू रुला के,
बस सत्ता पर निगाहें टिकाए बैठे होते हैं।
बांट के देश को करते हैं गठबंधन, बिन दिमाग के देश को विकास करने की बात यह नेता ही क्यों करते हैं।


                               By— Pradeep Yadav

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