मुझे लिखना आ गया

लिखना कुछ इस कदर भा गया,
दिल का दर्द स्याही से पन्नों में छप गया।
मुझे लिखना नहीं आता था,
शब्दों की हेर-फेर सीख गया।
एक ख्वाहिश मैं भी रखता हूं,
सपनों में भी नसीब बदल रहा यह देखता हूं।
लिख देता हूं मन की अपनी,
जो तुम पढ़ा रहे वह दिमाग से नहीं।
लोग अक्सर पूछते हैं कैसे लिख लेते हो?
जिंदगी के मायने इतनी बारीकी से कैसे जान लेते हो!!
मैं लिखता तो नहीं था पर अब लिखने लगा हूं,
कुछ लोगों की वजह से कुछ लोगों की यादें बुनने लगा हूं।
हां, अब मैं लिखने लगा हूं,
न जाने कैसे पर अब गम भी पीने लगा हूं।
मैं लेखक नहीं था,
लिखना तो मुझे उसकी यादों ने सिखाया है।
मुश्किल हालात में उसने बिना परवाह किए,
मेरा हाथ थामा है।
मैं रोता था पर मैं क्यों ना रोऊं,
यह मुझे उसने समझाया है।
हारा हुआ था मैं अपने आप से उसने मुझे उठाया था,
देख तो सब रहे थे पर हाथ तो उसने ही बढ़ाया था।
अनजान ही सही मौका आते ही मुझे अपनाया है,
अनजाने से ही सही पर छुपी कला से भी तो उसने ही रूबरू कराया है।
अल्फ़ाज़ों के इस शहर में, मुझे उसने ही तो लाया है।
कलम पकड़ने से भागता था,
आज इसी में अपनी ज़िन्दगी बसा लिया।
दिल की बात कुछ यूं लिखा,
कि सब ने मुझे कवि कह दिया।
लिखता हूं अल्फ़ाज़ कलम से तो सारे शब्द महसूस होते हैं,
न जाने कौन सा जादू कर दिया उसने की इन सबमें मुझे बखूबी घोल दिया।
दिल को करार, रूह को सुकून मिल गया,
वो मेरी ज़िन्दगी में क्या आयी।
मुझे लिखना आ गया और ज़िन्दगी जीना भी सिख गया।


                                            By— Pradeep Yadav

                                          

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