सोच का फर्क

फर्क तो सिर्फ सोच का है,
वरना लड़की घर में कहां सुरक्षित है।
फर्क तो सिर्फ सोच का ही है,
गरीब के मन में भी बड़ा बनने का सपना है।
रोक लेते हैं उसे उड़ने से कहते हैं तुम संभल के रहो,
वरना गलती तो निकलने वाले की ही होती है ना।
एक गरीब बिन सहारे के चलते-चलते दौड़ना सीख जाता है,
फर्क है तो सोच का।
दोष देते हैं अक्सर कपड़ों को वो बिन कपड़ों की जीना सीख गया,
सच ही तो है फर्क है तो सिर्फ सोच का।
उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी साबित कर दिया,
और वो गरीब तेज धूप में रहकर पेट पालना सीख गया।
चांद छूने की ख्वाहिश थी उसकी,
चंद शादी की तस्वीरों में सिमट गई।
वो गरीब मिट्टी को छाती से सटा के हर महीने मेहनत कर तरक्की छू गया।
अरे, सच ही तो है ना फर्क है तो सिर्फ सोच का जनाब,
वो गरीब लड़की थी, थोड़ी बदसूरत थी,
शायद यही उसकी एक खूबी थी।
वरना फर्क तो सिर्फ सोच का है जनाब।।


                              By— Pradeep Yadav

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